मज़हब का रंग

फिर उठी कटार और तलवारें,
इंसानियत को रख के सिरहाने !
शहर में निकल पड़े,
मज़हब भेदी खून में नहाने !!

आबाद हुआ करते थे जो मोहल्ले,
कब्रिस्तान की शक्ल ओढ़ी है !
इबादतें खामोश है,
हिंदुओ ने क़ब्रें जो खोदी है !!

लाल हो चली है ये सड़कें,
दीवारों ने चींखें लगाई है !
सूने हो गए घर के चिराग,
मुसलमानों ने चिता जो जलाई है !!

बंद हो धर्म के नाम पर ये आतंक,
दरगाह में चादर और मंदिर में दीये !
हो हरे की आरती और भगवे में अज़ान,
कि उठे अब हाथ,तो एक दूजे की रक्षा के लिए !!

3 thoughts on “मज़हब का रंग

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  1. बहुत खूब और सत्य लिखा है।
    बड़े जतन से जिसे बनाया
    कैसा बन बैठा इंसान,
    सोंच-सोंचकर सिसक रहा है,
    कहीं पर अल्लाह,
    कभी भगवान।

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