ख़्वाइश

बात महज़ एक रात की थी..
उम्र दराज़ तो न मांग ली थी..
चाँद की गवाही देकर..
रात ने अपनी ख़ामोशी तो न मांग ली थी !

वो कहते है..
कफ़ालत-ए-झूठ मुमकिन नहीं..
पूछे उनसे कोई दुनिया पर क्या ऐतबार है सही ?
बे मक़सद फिरती है ये रूहें,ज़िक्र इनका करना किफ़ायत तो नहीं !

खुद को ज़ंजीरो में जकड़ा है..
पंख काट बेड़ियाँ पायी है..
आईना तो देखती हो..
पर चेहरे पे ये रुहाँसी सी क्यूँ छाई है ?

तोड़ चल ये फ़िक्र-ए-सलाखें..
खुद को तू हवा कर ले..
खुला आसमान हूँ मैं तेरा..
आजा खुद को फना कर ले !

बनाके तुझे में साया..
आ जिंदगी से रूबरू करा दूँ..
मांगी तो सिर्फ एक रात थी..
कहीं फिर ता उम्र ही न मांग लूँ !

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