गाँव बहुत याद आता है

आँगन में रखी चारपाई
बगल में मिट्टी की सुराही..
गर्मियों में जोड़ा इन से नाता है
माँ ,तेरा गाँव बहुत याद आता है..!

चबूतरे पर सुनहरी शाम की दस्तक
दोस्तों की ठिठोली में यूँ गुजर जाती थी..
वही किस्से जब अब चाँद सुनाता है
माँ ,तेरा गाँव बहुत याद आता है..!

गल्ली के नुक्कड़ पर चाय की चुस्की
सर्द दिनों की धूप में..
मेहमान जब अब प्याला उठाता है
माँ ,तेरा गाँव बहुत याद आता है..!

बारिश की बूँदें पड़ती तो है,यहाँ भी और वहाँ भी
फर्क इतना कि मैं अब भी अनछुआ सा सूखा हूँ..
पर गीला मन बहुत रुलाता है
माँ ,तेरा गाँव बहुत याद आता है..!

दो वक़्त की रोटी के लिए
शहर की धूल में खो सा गया हूँ..
आँखें मलते हुए सोचता हूँ
क्या सच में तेरा गाँव भूल सा गया हूँ..!

6 thoughts on “गाँव बहुत याद आता है

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  1. खूबसूरत कविता वैसे तेरा गांव की जगह मुझे गांव होना चाहिए था।ये मेरा निजी राय है।
    बारिश की बूँदें पड़ती तो है,यहाँ भी और वहाँ भी
    फर्क इतना कि मैं अब भी अनछुआ सा सूखा हूँ..
    पर गीला मन बहुत रुलाता है
    माँ ,मुझे गाँव बहुत याद आता है..!

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